23 को मालूम होगा सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई में कहां खड़े हैं मोदी

  • इस चुनावी दौर में पिछले हफ्ते विश्व स्तर पर जाने माने समाचार पत्रिका ह्यटाइम मैगजीनह्ण के द्वारा नरेंद्र मोदी को ह्यइंडियाज डिवाइडर-इन-चीफह्ण बताना साफ दशार्ता है कि विश्व की ताकतें मोदी को और मजबूत होते नहीं देखना चाहतीं।
  • ऐसी स्थिति में जब इस देश में ज्यादातर लोग खुद भ्रष्ट हैं और हमेशा आसान रास्ते को तलाशने में लगे रहते हैं, किसी भी राजनितिक दल द्वारा भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर चुनाव जीतना आसान नहीं है।

मनीष तिवारी | मुख्य संपादक, डेली वर्ल्ड

भारत देश अनेकताओं में एकता का प्रतीक है। हालांकि सत्ता पर काबिज रहने के लिए यहाँ के राजनितिक दल एवं नेता इस देश को धर्म, जाति, भाषा एवं प्रान्त के नाम पर बांटने का काम कई दशकों से करते आ रहे हैं, इस चुनावी दौर में पिछले हफ्ते विश्व स्तर पर जाने माने समाचार पत्रिका ह्यटाइम मैगजीनह्ण द्वारा नरेंद्र मोदी को ह्यइंडियाज डिवाइडर-इन-चीफ (देश को बांटने वाला व्यक्ति)ह्ण बताना साफ दशार्ता है कि विश्व की ताकतें भी मोदी को और मजबूत होते नहीं देखना चाहतीं।

भले ही प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए ह्य130 करोड़ लोगोंह्ण का बार-बार जिक्र करते हैं, उनके ये शब्द कहीं न कहीं दुनिया के ताकतवर देशों एवं राजनेताओं को नागवार गुजरते होंगे। मोदी के भाषण उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए काफी है कि भारत की आबादी 130 करोड़ होने के कारण यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इतने लोगों का प्रधानमंत्री के रूप में प्रतिनिध्त्वि करना स्वत: अपने को ह्यवर्ल्ड लीडरह्ण के रूप में देखने के बराबर है। चाहे उनके रिश्ते कितने भी अच्छे हों, दुनिया के कई ताकतवर नेता — अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हों या रूस के व्लादिमीर पुतिन या फिर चीन के राष्ट्रपति शी पिंग — को मोदी की लोकप्रियता शायद ही रास आती होगी। आज जब देश में राजनितिक पार्टियों का सब कुछ दाव पर लगा हो, ह्यटाइम मैगजीनह्ण द्वारा कवर पेज पर प्रधानमंत्री मोदी के बारे में इस तरह की बातें लिखना कहीं से भी उचित नहीं है।

वैसे भी, इतने बड़े देश में जहां आतंकवाद एक बड़ी समस्या हो; आठ राज्यों के करीब 707 जिलों में से 90 जिले नक्सल प्रभावित हों, जहाँ लोग सरकार के शासन को ही नहीं मानना चाहते हों; एक तरफ बदहाली, भुखमरी एवं बेरोजगारी से लोग त्रस्त हों और दूसरी तरफ अडानी एवं अम्बानी जैसे अमीर लोग हों; उस देश को संभाल कर चला लेना ही किसी भी नेता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। मोदी विदेशी ताकतों के लिए एक मिसाल हैं, दुनिया जो भी सोचे, वे सचमुच एक ह्यवर्ल्ड लीडरह्ण हैं जिस बात का संज्ञान लेने के लिए आज सभी ताकतवर देश मजबूर हैं।

विडम्बना यह है कि अपने देश में ज्यादातर लोग खुद भ्रष्ट हैं और हमेशा आसान रास्ते को तलाशने में लगे रहते हैं। वे अपने लिए कुछ और एवं दूसरों के लिए कुछ और मापदंड रखते हैं तथा अपने नेताओं से कुछ हद से ज्यादा ही अपेक्षा रखते हैं। ऐसी स्थिति में जब इस देश में ज्यादातर लोग एवं नेता भ्रष्ट हैं और देश को धर्म एवं जाति के नाम पर बांटने में लगे हैं, किसी भी राजनितिक दल द्वारा भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर चुनाव जीतना आसान नहीं है।

कई राज्यों में मुख्यमंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने चले नेताओं को पहले ही यह बात समझ में आ चुकी है कि कैसे इन बातों को छेड़ कर उन लोगों ने अपना समय गंवाया। शायद प्रधानमंत्री मोदी को भी चुनाव परिणाम आने के बाद यह जरूर एहसास होगा।

मोदी आशावादी हैं और देश के गंभीर हालात को देखते हुए उन्होंने कई कदम उठाने की भी कोशिश की। लेकिन इस देश की समस्याएं इतनी जटिल है कि एक तरफा सोच रखकर इसको चलाया नहीं जा सकता। भले ही समस्याओं को सुलझाने में देर लगे परन्तु समाज को एक साथ लेकर चलने में ही न केवल देश का हित है बल्कि उन राजनेताओं का भी हित उसमें निहित है।

मेरा मानना है कि इस देश को चलाना किसी ह्यब्यूरोक्रैट, टेक्नोक्रैट या फाइनेंशियल विजार्डह्ण के बस की बात नहीं है। इसको आगे ले जाने के लिए इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेताओं (स्टेट्समेन) की जरूरत है। वो इंदिरा जिन्होंने अमरीकी दबाव को दरकिरनार करते हुए 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग करवा दिया था, और वो प्रधानमंत्री वाजपेयी जिन्होंने 16 पार्टियों की गठबंधन सरकार को चलाते हुए भी राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण करके सारी दुनिया को दिखा दिया था कि एक मजबूत नेतृत्व का मतलब क्या होता है। इन दोनों राजनेताओं ने भारत को सामरिक दृश्टिकोण से और मजबूत बनाने की दिशा में अहम भूमिका अदा की थी।

यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की साख दुनिया में बढ़ी है। विपक्ष के लोग माने या ना माने, उनके कार्यकाल के दौरान कई अच्छे काम भी हुए हैं और कई पहलुओं पर देश ने प्रगति भी की। फर्क सिर्फ इतना है कि वाजपेयी जैसे उदारवादी नेता सभी को साथ लेकर चलना जानते थे और आम सहमति की कद्र करते थे। वहीं मोदी ह्यजैसे-को-तैसाह्ण में विश्वास रखते हैं। उनके शासन काल में कई नेता सीबीआई से शिकंजे में कसते हुए नजर आये तो कइयों को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा।

आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में पार्टियों के बीच विचारधारा की लड़ाई नहीं रह गयी है, न ही मुद्दों की राजनीति हो रही है। अब तो बस कुर्सी की लड़ाई है। पार्टियां अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार पासा बदल लेती है — आज यहां तो कल वहां…।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का लालू यादव की पार्टी से नाता तोड़ कर बीजेपी के साथ सरकार बना लेना; उसके बाद लालू यादव का जेल जाना; समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव एवं बसपा प्रमुख मायावती का उत्तर प्रदेश में गठबंधन कर लोक सभा का चुनाव लड़ना, यही दशार्ता है कि सत्ता के लिए आज नेता कुछ भी करने को तैयार हैं। आज ह्यजिसकी लाठी उसकी भैंसह्ण वाली राजनीति ज्यादा देखने को मिल रही है। विकास के मुद्दे गौण हो गए हैं, पार्टियां ज्यादातर भावनात्मक मुद्दों पर वोट मांग रही हैं।

कोई देश का चौकीदार बना हुआ है तो कोई उसी ह्यचौकीदार को चोरह्ण ठहराने में लगा हुआ है। जो सरकार में है या सरकार के साथ है वह ईमानदार है, बाकी सब चोर! ऐसे समय में कौन इस देश की संस्थाओं में भरोसा करेगा जहां सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ही कहते हैं कि उनके खिलाफ कुछ ताकतों के द्वारा षड़यंत्र रचा जा रहा है। सवाल यह है कि अगर वो महफूज नहीं हैं तो इस देश में आम आदमी को कौन पूछेगा?

सबको मालूम है कि इस देश के 130 करोड़ लोगों की आवश्यकता एवं उम्मीदों को पूरा करना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। चुनावों में राजनितिक दल बड़े-बड़े वायदे कर किसी प्रकार सत्ता तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन कुछ ही समय में लोगों का विश्वास खो देते हैं। शुरू में हर सरकार कुछ अच्छा करने की कोशिश करती है लेकिन समय बीतने के साथ-साथ मारधाड़ की राजनीति शुरू हो जाती है। अपने सत्ता पर काबिज रहने एवं वर्चस्व की लड़ाई में धीरे-धीरे देश की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं भी लड़खड़ा गई हैं। कांग्रेस के शासनकाल में भी स्थिति कोई खास अच्छी नहीं थी, लेकिन जो बातें परदे के पीछे होती थी वो अब प्रत्यक्ष हो रही हैं। बात आरबीआई की हो या सीबीआई की, एक-एक कर के कई संस्थाओं ने अपनी स्वतंत्रता खो दी है।

आज अगर कोई राजनेता अपने से बड़ों का पांव छू ले तो उसको भी राजनीति के तराजू में ही तौला जाता है — भले ही वो पांव चाहे आडवाणी का हो या प्रकाश सिंह बादल का…। प्रधानमंत्री ने हाल ही में जब बादल का पांव छूकर आशीर्वाद लिया तो राजनीतिक पंडितों ने यहां तक सोच लिया कि मोदी को मालूम है कि अगर एनडीए को बहुमत नहीं मिली तब उनके लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाने में बादल काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं।

लोक सभा के अंतिम चरण का चुनाव अभी बाकी है लेकिन सबके जुबान पर एक बात जरूर है कि भारत एक कठिन दौर से गुजर रहा है और जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। ऐसे दौर में देश को संभाल कर रखना और आगे ले जाना ही किसी भी नेता — वो मोदी हों या राहुल या कोई और — के लिए बहुत बड़ी बात होगी। अब सबको 23 मई का इंतजार है जिस दिन दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में हो रहे चुनाव का फैसला आ जायेगा और उसके बाद न केवल देश का भविष्य एक बार फिर तय होगा, बल्कि यह भी पता चल जायेगा कि प्रधानमंत्री मोदी लोगों की नजरों में खरे उतरे या नहीं।

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