योजना लागू होते ही सूख गया नीतीश सरकार के नल में जल

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पांच साल में नल-जल योजना पर करीब 7,400 करोड़ रुपए खर्च होना है और करीब 30 लाख घरों में पीने का पानी पहुंचना है।

सरकार अरबों रुपये खर्च कर चुकी है लेकिन ज्यादातर घरों में पानी नहीं आता। नीतीश कुमार की यह योजना आज ‘हास्य एवं शोध’ का विषय बनकर गयी है।

मनीष तिवारी | मुख्य संपादक, डेली वर्ल्ड

नीतीश बाबू, कहां है नल में जल…लोग पूछ रहे हैं। मैं स्वयं पूर्वी चम्पारण जिले में रामगढ़वा का रहने वाला हूं। कुछ महीनों पहले आपके सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना के तहत मेरे घर में भी प्लास्टिक का पाइप लगा था। दो दिन पानी आया, उसके बाद कभी नहीं आया। यही हाल हमारे प्रखंड में घर-घर का है। यहां के जनप्रतिनिधि, बीडीओ एवं अन्य अधिकारियों ने मिल-बैठ कर काम कर लिया और आपको पता तक नहीं चला।

सरकार इस योजना के नाम पर अपनी पीठ जरूर थपथपा ले, लेकिन सही मायनों में इस योजना के नाम पर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है…आम जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रूपया इस प्रखंड में बंट गया, लेकिन न तो कोई सुनने वाला है और न ही पूछने वाला।

पूर्वी चम्पारण हो या पश्चिमी चम्पारण या फिर शिवहर, ज्यादातर जिलों में यही हाल है। नीतीश कुमार की यह यशस्वी योजना आज मात्र ‘हास्य एवं शोध’ का विषय बनकर रह गई है।

सब जानते हैं कि सरकार की अनेक योजनाओं की तरह नल-जल योजना में भी कमीशन का खेल हो रहा है। ऐसे में जबकि ज्यादातर लोग आपस में मिले हुए हैं, इस बात का संज्ञान कौन लेगा? कौन किससे करे शिकायत और किसको दे दुहाई!

बता दें कि सन 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में 7 निश्चय किया था उनमे से एक था, हर घर में स्वच्छ नल का जल देना। योजना काफी बड़ी है और सरकार का लक्ष्य इसको 2020 तक पूरा करने का है।

पांच साल में इस योजना पर करीब 7,400 करोड़ रुपए खर्च होना है और करीब 30 लाख घरों में इस योजना के तहत पीने का पानी पहुंचाना है। सरकार का दावा है कि 3 लाख से ज्यादा घरों में पानी पंहुचाने का काम हो चुका है।

विभागीय दिशा निर्देश के अनुसार, प्रत्येक परिवार को तीन कनेक्शन देकर नल के जरिये शुद्ध पेयजल पहुंचाना है। तीनों नल कॉपर टैप होना चाहिए एवं हर वार्ड में 200 फीट गहरा बोरिंग होना आवश्यक है। पंप हाउस से वार्ड के सभी घरों तक पानी पहुंचाने के लिए मेन पाइपलाइन ढाई इंच व्यास का और डिस्ट्रीब्यूशन पाइपलाइन डेढ़ इंच व्यास का होना चाहिए।

लेकिन शायद ही कोई वार्ड इन दिशा निदेर्शों का पूर्णत: पालन कर रहा है। ठेकेदार खुलेआम कहते हैं कि जब इस योजना का आधा से ज्यादा पैसा बांटना पड़ रहा है, तो मानक के अनुरूप सामग्री के खरीद का प्रश्न कहां उठता है?

धरातल पर ऐसा खेल होते देख विचार आता है कि नीति निर्धारकों को इस तरह योजना बनाने एवं इतने बड़े पैमाने पर सरकारी धन खर्च करने से पहले कई बार सोचना चाहिए। लोगों का अरबों रुपये खर्च होने के बाद राज्य में कुछ ही जगह होंगे जहां अच्छा काम हुआ है और नल में पानी आ रहा है। ज्यादातर जिलों में यह योजना फेल हो चुकी है एवं सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गई है।

हैरानी की बात यह है कि यूनीसेफ ने हाल ही में इस योजना के क्रियान्वयन की सराहना की। मैं स्वयं उन यूनीसेफ के महानुभावों से मिलना चाहूंगा। अगर उन्हें केवल कागजी कार्रवाई ही करनी थी तो बिहार आने की भी क्या जरूरत थी? वो कहां गए, किससे मिले, हमें नहीं पता, लेकिन अगर वे दुबारा ‘नल जल योजना’ को देखना चाहें तो मैं खुद इन लोगों को पूर्वी चम्पारण जिले के कई जगहों पर ले जाना चाहूंगा जहां नल में एक बूंद भी पानी नहीं आता।

मानक के अनुसार नल लगा नहीं…जल का नामो-निशान नहीं, लेकिन बिहार के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने हाल ही में ऐलान कर दिया कि सरकार ने नल-जल योजना को सुचारु ढंग से चलाने के लिए गरीबी रेखा से नीचे के लोगों से 30 रुपये तथा ऊपर वालों से 60 रुपये महीना लेने का निर्णय लिया है। लोगों में क्षोभ है, वे कहने लगे हैं कि ऐसा करने से तो अच्छा होता कि सरकार गांव में कुछ चापाकल ही गड़वा देती, कम से कम पानी तो आता।

सन 1980 के आसपास सरकार की ऐसी ही एक नल-जल योजना बनी थी जिसके तहत रामगढ़वा के अलावा कई हजार गांवों में पाइपलाइन बिछाये गए। करोड़ों रुपये खर्च किये गए; उस समय भी दो दिनों के लिए पानी आया था, उसके बाद आज तक नहीं आया। पीने का पानी देने की आड़ में लोगों के रुपये पानी में चले गए। यह योजना भी पटना सचिवालय के हजारों फाइलों में दब कर रह गई।

आज जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, उनसे आम लोगों की बहुत अपेक्षाएं हैं। उनकी योजनायें भी महत्वाकांक्षी रही हैं और मंशा भी ठीक लगती है। लेकिन ऐसा क्यों है कि उनमें से कई योजनाओं का न तो धरातल पर क्रियान्वयन ठीक हो पाता है, और न ही आम जनता को इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ मिल पाता है? और यह कैसे हो सकता है कि सरकार के आंखों के सामने अरबों रुपये का बंदरबांट हो रहा हो और मुख्यमंत्री को पता तक न हो?

क्या यह हो सकता है…नीतीश बाबू?

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