मोदी-शाह की ‘यूनाइट एंड रूल’ नीति ने विपक्ष को किया स्तब्ध

मनीष तिवारी | मुख्य संपादक, डेली वर्ल्ड

  • देश में कई पार्टियां जनता को धर्मनिरपेक्षता की आड़ में जाति के आधार पर बांट कर राज (डिवाइड एंड रूल) करती रही हैंं। वहीं मोदी-शाह इन चुनावों में ह्ययूनाइट एंड रूलह्ण की नीति पर चले और जनता को हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पक्ष में एकजुट करने में कामयाब हो गए।
  • इस बार लोगों ने वोट एमपी को नहीं बल्कि पीएम को डाला।

मोदी है तो मुमकिन है! पिछले लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बीजेपी 272 का आंकड़ा पार करेगी और अपने दम पर सरकार बनाएगी, वही हुआ। इस बार उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस बार 300 का आंकड़ा पार करेगी, वह फिर सही साबित हुए। पिछले 6 दशकों में जो काम बीजेपी नहीं कर पाई वो नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने 2019 लोक सभा चुनावों में कर दिखाया। विपक्ष के साथ साथ बीजेपी के भी कई दिग्गज स्तब्ध हैं; किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा कि बीजेपी पिछले लोक सभा चुनाव के आंकड़ों को भी पार करते हुए 303 सीटें कैसे ले आई?

मोदी-शाह के अलावा शायद ही कोई बीजेपी नेता होगा जिसने इस चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया होगा। इस बार बीजेपी के कई बड़े दिग्गज नेता या तो हाशिये से बैठ कर लोक सभा चुनाव देखते रहे या फिर मोदी-शाह द्वारा हाशिये पर धकेल दिए गए। कई दशकों के बाद ऐसा देखने को मिला है, जब लोगों ने वोट एमपी को नहीं बल्कि पीएम को डाला। चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय मुद्दे गौण थे; सांसद या लोकसभा प्रत्याशियों ने अपने-अपने क्षेत्र में मेहनत किया था या नहीं, इस बात से चुनाव के नतीजों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। लोगों ने आंख बंद कर मोदी के लिए बटन दबा दिया। लोग ऐसा कभी इंदिरा गांधी के दिनों में किया करते थे। हालांकि उन दिनों क्षेत्रीय स्तर के नेता भी पार्टी के जीत में बड़ी भूमिका निभाते थे।

बीजेपी के पक्ष में इतने भारी जनादेश के बाद जो लोग इवीएम में गड़बड़ी की बात कर रहे थे उन्हें बगले झाँकने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा होगा। राहुल गांधी ने तो बीते शनिवार कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में त्याग पत्र देने की भी पेशकश कर दी, जिसे उनकी पार्टी ने ठुकरा दिया। आज विपक्ष में बैठे कई दिग्गज अपना त्याग पत्र लेकर यहां वहां भटक रहे हैं।

वहीं, प्रधानमंत्री पद के सपने देखने वाली बसपा प्रमुख सुश्री मायावती हों या सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, या फिर राजद नेता तेजस्वी यादव, सभी को समझ में आ गया होगा कि जो पार्टियां देश की जनता को धर्मनिरपेक्षता की आड़ में क्षेत्र एवं जाति के आधार पर बांट कर राज (डिवाइड एंड रूल) करती रही हैं उनके दिन लद गए हंैं। वहीं मोदी-शाह इन चुनावों में ह्ययूनाइट एंड रूलह्ण की नीति पर चले और जनता को कहीं न कहीं हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पक्ष में एकजुट करने में कामयाब हो गए। इस बार, बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों द्वारा खींची गयी छोटी लकीर के ऊपर एक लम्बी लकीर खींच दी।

23 मई को दिल्ली स्थित बीजेपी कार्यालय में पार्टी समर्थकों को सम्बोधित करते हुए मोदी ने कहा कि इस बार राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा जनता के मूड को समझने में चूक हो गई। 2019 चुनावों में कांग्रेस पार्टी 17 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई।

वहीं, चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले ह्यकिंग मेकरह्ण की भूमिका निभाने वाले आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पार्टी को खुद 25 में से 3 सीट ही मिल पाए। टीएमसी प्रमुख एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पार्टी का भी वही हाल है। कई जगहों पर टीएमसी को बीजेपी ने करारी शिकस्त दी है।

कांग्रेस पार्टी केवल केरल एवं पंजाब में ही अपना दमखम दिखा पाई। अगर पंजाब की बात करें तो यहाँ न तो यह कांग्रेस की जीत है और न ही राहुल गांधी की। विधान सभा चुनावों की तरह ही इस बार भी इस जीत का श्रेय पार्टी से ज्यादा मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को जाता है, जिनकी अच्छी छवि एवं नेतृत्व के कारण मोदी-शाह का जादू अमरिंदर सिंह के सामने नहीं चल पाया।

दूसरी तरफ, जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी से समय रहते गठबंधन कर एक बार फिर अपने राजनीतिक कौशल एवं सफल नेतृत्व का परिचय दिया, जिसके कारण बिहार में बीजेपी-जेडी (यू)-एलजेपी गठबंधन ने 40 में से 39 सीट जीत कर दूसरे सभी दलों को परास्त कर दिया।

बीजेपी के इस जीत के बाद पिछली बार की तुलना में विपक्ष और कमजोर हो गई है। मोदी-शाह की जोड़ी ने गुजरात में पिछले दो दशकों में जो विपक्ष का हाल किया, वही अब राष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिलने लगा है। कांग्रेस पार्टी जो गरीबों की बात कर पिछले कई दशकों से चुनाव जीतती आ रही थी, वह मुद्दा भी बीजेपी ने इस बार उनसे छीन लिया। इस बार गरीबों ने आंख बंद

कर मोदी के पक्ष में वोट दिया।

आज न तो कोई विपक्ष बचा है और न ही उनके पार्टी में कोई नेता, जो मोदी-शाह की जोड़ी को कोई खास चुनौती दे सके। बीजेपी के पक्ष में इस तरह के अप्रत्याशित परिणाम आने के बाद अब कई बड़े नेता, दूसरी पार्टियों के समर्थक एवं उनके साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) भी अपना रुख बीजेपी की तरफ करने की कोशिश करेंगे।

आने वाले दिनों में विपक्षी दल मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दों को तलाशने में जुट जायेंगे, वहीं मोदी-शाह की जोड़ी उन मुद्दों पर काम काम करना चाहेगी जो अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं। मुद्दा राम मंदिर का हो या फिर अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म करने का, आने वाले दिनों में बीजेपी का ध्यान इन बातों पर जरूर जायेगा। गरीबी हो बेरोजगारी; नक्सलवाद हो या आतंकवाद या पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने की बात; या फिर किसानों से लेकर व्यापारियों की समस्याएं; अगले पांच साल में मोदी सरकार इन मुद्दों पर जरूर कोई ठोस कदम उठाने की कोशिश करेगी।

समस्याएं गंभीर हैं और मोदी का अगले पांच साल का कार्यकाल चुनौतियों से भरा होगा। लोगों ने मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर से भरोसा जताया है। वह मेहनती हैं, दूरदर्शी हैं और उनमें इस देश को आगे ले जाने की क्षमता है। ऐसी स्थिति में ह्यजैसे को तैसाह्ण में विश्वास रखने वाले मोदी अगर सचमुच में ह्यसबका साथ, सबका विकासह्ण की दिशा में पहल करें और अटल बिहारी वाजपेयी की तरह थोड़े भी उदारवादी हो जाएं, तो भारत के इतिहास में शायद ही कभी कोई उनके जैसा प्रभावशाली प्रधानमंत्री हो पाए।

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