नीतीश सरकार, ऐसी सरकारी शिक्षा के लिए कौन है जिम्मेवार?

  • पंचायती राज संस्था बने नियोजित शिक्षकों के भाग्य विधाता; कागज पर चल रहे हैं कई सरकारी विद्यालय
  • शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि पूर्वी चम्पारण जिले में ही करीब 1,600 से ज्यादा फर्जी शिक्षकों की बहाली हुई है।

मनीष तिवारी | मुख्य संपादक, डेली वर्ल्ड

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शासन काल में भले ही कई महत्वपूर्ण योजनाओं को लागू कराया होगा, लेकिन उनकी सरकार का एक निर्णय — जिसके तहत सन 2007 के बाद करीब 3.4 लाख नियोजित शिक्षकों की आनन-फानन में बहाली हुई — ने समूचे राज्य में शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार कर दिया है। आज बिहार में प्राथमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था चरमरा ही नहीं गई है, बल्कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो इसका खामियाजा आगे कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।

ज्ञात हो कि सन 2006 में शिक्षक नियोजन नियमावली बनने के बाद 2007 में पंचायत, प्रखंड, जिला परिषद् तथा नगर निकाय द्वारा लाखों नियोजित शिक्षकों की बहाली की गई। हालांकि बहुत जगहों पर इन शिक्षकों की बहाली उनके योग्यता के आधार पर हुई, हजारों की संख्या में ऐसे भी नियोजित शिक्षक बहाल कर लिए गए जिनमें से कई या तो असामाजिक तत्व रहे थे या जिनके पास जाली शैक्षणिक प्रमाण पत्र थे या फिर, जिन लोगों का पढ़ाई से दूर-दूर से सम्बन्ध नहीं था।

सरकार की योजना ठीक थी लेकिन नीति निर्धारण में कहीं चूक हो गई। राज्य स्तर पर बहाली का मुख्य उद्देश्य बिहार में बेरोजगारी को दूर करना तथा छात्र-शिक्षक अनुपात को भारत सरकार के मानकों के अनुरूप बनाना था। संसाधन की कमी को ध्यान में रखते हुए लागू की गई इस योजना में नियोजित शिक्षकों को हर महीने 6,000-8,000 रुपये की राशि देना तय हुआ जो आज बढ़कर 22,000 से 28,000 रुपये हो गया है।

हालांकि इन नियोजित शिक्षकों का चयन योग्यता के आधार पर होना था, पंचायत स्तर पर हुए बहाली में चयन प्रक्रिया की धज्जियां

उड़ाकर रख दी गई। नियोजन प्रक्रिया के प्रारम्भ में प्रमंडल स्तर पर अनुश्रवण करने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा प्रतिनियुक्त पदाधिकारियों ने भी बड़े पैमाने पर धांधली होता पाया। पैरवी का पूरा खेल हुआ; पंचायत स्तर पर ज्यादातर बहाली पैसे लेकर की गई और जो लोग शिक्षा से दूर थे उनको भी बच्चों को पढ़ाने का दायित्व सौंप दिया गया।

आज स्थिति कुछ इस प्रकार है — बिहार शिक्षा विभाग द्वारा पूर्वी चम्पारण जिले में की गई एक उच्चस्तरीय जांच के दौरान 400 से ज्यादा फर्जी शिक्षक पाए गए हैं। इन सभी नियोजित प्रारंभिक शिक्षकों की नियुक्ति जाली टीईटी एवं सीटीईटी या अन्य प्रमाण पत्र के आधार पर की गई थी। शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि पूर्वी चम्पारण जिले में ही करीब 1,600 से ज्यादा फर्जी नियोजित शिक्षकों की बहाली हुई है। समस्तीपुर से लेकर अन्य जिलों का भी यही हाल है।

अगर अधिकारी या विधायक इन शिक्षकों को स्कूल में पढ़ाने के लिए कहते हैं तो ये बुरा मान जाते हैं। नियमावली के अनुसार, पंचायती राज संस्थाएं ही इनके विरुद्ध कार्रवाई कर सकती हैं। चूंकि ज्यादातर नियोजित शिक्षक शिक्षण कार्य स्थल के इर्द-गिर्द के ही लोग हैं, ऐसे में कौन पंचायत इनको दण्डित करेगा?

सरकार ने नीति निर्धारण में गलती तो कर दी थी, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने नीतीश सरकार को भारी राहत पहुंचाया होगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त करते हुए बिहार सरकार की अपील मंजूर कर ली है, जिसमें समान काम के बदले समान वेतन देने का निर्णय दिया गया था। इस मामले में केंद्र सरकार ने अपने दलील में कहा था कि नियोजित शिक्षकों की बहाली पंचायती राज संस्था से ठेके पर हुई है, इसलिए इन्हें समान वेतन नहीं दिया जा सकता है।

यही नहीं, सरकारी विद्यालयों पर हो रहे खर्च का भी वही हाल है। पिछले ही साल, वित्तीय नियमावली की धज्जियाँ उड़ा कर हजारों हाई स्कूल और उत्क्रमित विद्यालयों में प्रयोगशाला बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये का बंदरबांट हुआ। राज्य सरकार ने यह राशि विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए दी थी, लेकिन शिक्षा माफिया ने कुछ भ्रष्ट अधिकारियों एवं स्कूल के कर्मचारियों के साथ मिलकर काफी बड़ी राशि का गबन कर लिया।

आकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार ने पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 6,000 उच्च एवं उत्क्रमित विद्यालयों में प्रयोगशाला सामग्री क्रय के लिए 220 करोड़ रुपये और करीब उतनी ही राशि उपस्कर (जैसे कि डेस्क, बेंच, टेबर्ल, कुर्सी, अलमारी इत्यादि) खरीदने के लिए आबंटित किया था। लेकिन इन विद्यालयों ने सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर आनन-फानन में कई सौ करोड़ खर्च कर दिए, और इसके बावजूद ज्यादातर विद्यालयों में प्रयोगशाला आज भी केवल कागजों में है। कई विद्यालयों में न कोई टेंडर हुआ और न ही कोई कोटेशन लिया गया। सारे नियमों को ताक पर रख दिया गया। आज सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई से ज्यादा शिक्षकों का समय छात्रवृत्ति, पोषण एवं पोशाक राशि, आदि के वितरण में ही बीत जाता है। आज सरकारी विद्यालयों में पठन-पाठन का स्तर गिरने के कारण गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने के लिए विवश है। ऐसी स्थिति ने जनता की गाढ़ी कमाई का हजारों करोड़ जो इन शिक्षकों और विद्यालयों पर खर्च हो रहा है, उसकी उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

योजना बनाने के पीछे सरकार की मंशा ठीक हो सकती है, लेकिन बिहार में सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की दुर्दशा के पीछे कहीं न कहीं सरकार के नीतियों का भी हाथ है। भूल हुई है…और सुधार करने का अभी भी वक्त है। आज जरूरत है कि सरकार एक बार फिर अपनी नीतियों पर फिर विचार करे, योग्य शिक्षकों को महत्व दे और हजारों की संख्या में बहाल किये गए फर्जी शिक्षकों को तुरंत बाहर करे; प्रयोगशाला एवं भवन निर्माण आदि के नाम पर हो रहे बंदरबांट को रोके तथा स्कूली शिक्षा के साथ हो रहे खिलवाड़ पर अंकुश लगाए। समय रहते अगर कदम नहीं उठाया गया तो आने वाली पीढ़ियां नीतीश सरकार को कभी माफ नहीं करेगी।

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